E20 Petrol : पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने को लेकर देश में नई बहस शुरू हो गई है। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने E20 पेट्रोल को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि पुराने बाइक और स्कूटरों के लिए E20 पेट्रोल परेशानी का कारण बन सकता है।

Written by Kajal Panchal • Published on : 17 August 2026
IBN24 NEWS NETWORK : नागेश्वरन ने अपने लेख में कहा कि पुराने दोपहिया वाहनों के लिए E10 पेट्रोल की बिक्री फिर शुरू की जानी चाहिए। उनके मुताबिक, देश में करीब 8 करोड़ पुराने बाइक-स्कूटर चल रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे वाहनों की है, जो पुरानी कार्बोरेटर तकनीक पर बने हैं।
हालांकि, सरकार E20 पेट्रोल का लगातार बचाव कर रही है। सरकार का कहना है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग से कच्चे तेल के आयात में कमी आई है। इसके अलावा, विदेशी मुद्रा की बचत हुई है और किसानों को भी अतिरिक्त आय मिली है।
E20 पेट्रोल क्या है और पुराने वाहनों में क्या परेशानी हो सकती है ?
E20 पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाया जाता है। वहीं, E10 पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा 10% होती है। E85 में 85% एथेनॉल होता है। CEA के मुताबिक, पुराने कार्बोरेटर वाले वाहन E20 के लिए उसी तरह तैयार नहीं हैं जैसे नए वाहन। एथेनॉल में ऑक्सीजन की मात्रा ज्यादा होती है। इसलिए पुराने इंजन हवा और ईंधन के नए मिश्रण को आसानी से एडजस्ट नहीं कर पाते।

इसके कारण पुराने वाहनों में इंजन ज्यादा गर्म होने की समस्या हो सकती है। इसके अलावा, एथेनॉल के लंबे समय तक इस्तेमाल से रबर पाइप और कुछ दूसरे पार्ट्स के खराब होने का खतरा भी बताया गया है। नागेश्वरन के अनुसार, जब तक इन पुराने वाहनों में जरूरी मॉडिफिकेशन नहीं किए जाते, तब तक पेट्रोल पंपों पर E10 पेट्रोल का विकल्प भी उपलब्ध रहना चाहिए। इससे पुराने वाहनों को उनकी तकनीक के अनुसार ईंधन मिल सकेगा।
देश में करीब 8 करोड़ पुराने दोपहिया वाहन
CEA के अनुसार, भारत में इस समय करीब 8 करोड़ पुराने बाइक और स्कूटर चल रहे हैं। इनमें ऐसे वाहन भी शामिल हैं जो BS-IV इंजन नियम लागू होने से पहले की कार्बोरेटर तकनीक पर आधारित हैं।
2014 के बाद एथेनॉल ब्लेंडिंग ने पकड़ी रफ्तार

2014 के बाद सरकार ने एथेनॉल की कीमत तय करने की व्यवस्था शुरू की। इसके अलावा गन्ने के साथ मक्का और अतिरिक्त चावल जैसी फसलों से भी एथेनॉल बनाने की अनुमति दी गई। इससे एथेनॉल की उपलब्धता बढ़ी और पेट्रोल में ब्लेंडिंग की प्रक्रिया ने तेजी पकड़ी। सरकार ने बाद में राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति के तहत एथेनॉल ब्लेंडिंग के लिए लक्ष्य तय किए। शुरुआत में पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने का लक्ष्य 2030 तक हासिल करना था। हालांकि, भारत ने E20 का लक्ष्य तय समय से करीब 5 साल पहले ही हासिल कर लिया।
किसानों को भी हुआ फायदा

एथेनॉल की बढ़ती मांग का फायदा गन्ना, मक्का और चावल जैसी फसलें उगाने वाले किसानों को भी मिला है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार, एथेनॉल उत्पादन के कारण किसानों को 1.60 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की अतिरिक्त आय होने का दावा किया गया है। इसके अलावा, एथेनॉल की मांग बढ़ने से चीनी मिलों को भी किसानों को भुगतान करने में मदद मिली है।
CO₂ उत्सर्जन में भी कमी का दावा

एथेनॉल ब्लेंडिंग को पर्यावरण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, एथेनॉल के इस्तेमाल से करीब 930 लाख मीट्रिक टन CO₂ उत्सर्जन कम हुआ है। इस कमी को करीब 50 लाख कारों के चार साल के उत्सर्जन के बराबर बताया गया है। इसलिए सरकार एथेनॉल को ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ कार्बन उत्सर्जन कम करने की नीति का भी हिस्सा मानती है।
लेकिन एथेनॉल से खाद्य संकट की चिंता क्यों ?

दूसरी ओर, CEA वी. अनंत नागेश्वरन ने एथेनॉल उत्पादन के लिए खाद्य फसलों के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई है। एथेनॉल बनाने के लिए गन्ना, मक्का और चावल जैसी फसलों का इस्तेमाल होता है। यदि एथेनॉल बनाने वाली कंपनियां ज्यादा कीमत देकर मक्का खरीदती हैं, तो पोल्ट्री और डेयरी उद्योग के लिए चारा महंगा हो सकता है। /farmers-ethanol-income
30% एथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर चेतावनी

CEA ने एथेनॉल ब्लेंडिंग को 20% से आगे बढ़ाने को लेकर भी सावधानी बरतने की बात कही है। उनके अनुसार, यदि पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा 20% से बढ़ाकर 30% की जाती है, तो खाद्य संकट का खतरा बढ़ सकता है।
चीनी उत्पादन पर भी असर
एथेनॉल की बढ़ती मांग का असर चीनी उद्योग पर भी पड़ रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस सीजन में देश के कुल सालाना चीनी उत्पादन का करीब 10%, यानी लगभग 30 लाख टन चीनी, एथेनॉल बनाने में इस्तेमाल की गई है।

इससे आने वाले समय में घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ सकती है। साथ ही, अगर चीनी की आपूर्ति कम होती है तो कीमतों पर भी असर पड़ सकता है। इसी वजह से सरकार आने वाले सीजन में एथेनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल को सीमित करने पर विचार कर सकती है, ताकि देश में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे और कीमतों पर ज्यादा दबाव न पड़े। /sugar-price-news
एथेनॉल के लिए पानी की खपत भी बड़ा सवाल
इसके अलावा, एथेनॉल उत्पादन से जुड़ी पानी की खपत भी एक बड़ा मुद्दा बन रही है। गन्ना ऐसी फसल है जिसे उगाने में काफी पानी की जरूरत होती है। इसलिए केवल एथेनॉल फैक्ट्री में इस्तेमाल होने वाले पानी को देखना पर्याप्त नहीं है।

CEA का कहना है कि गन्ना उगाने में इस्तेमाल होने वाले भूजल का भी हिसाब होना चाहिए। यानी जिस पानी का इस्तेमाल पीने, खेती और दूसरी जरूरतों के लिए किया जा सकता है, उसका एक बड़ा हिस्सा ऐसी फसल उगाने में खर्च हो सकता है जिसे बाद में एथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए एथेनॉल की वास्तविक लागत का आकलन करते समय पानी की खपत को भी शामिल करना जरूरी है।
सरकार का पक्ष क्या है ?
हालांकि, सरकार ने E20 ब्लेंडिंग कार्यक्रम का लगातार बचाव किया है। सरकार का तर्क है कि E20 से विदेशी मुद्रा की भारी बचत हो रही है। इसके अलावा, किसानों को उनकी फसलो

सरकारी टेस्टिंग के आधार पर यह भी कहा गया है कि E20 से वाहनों के इंजन को बड़े स्तर पर नुकसान होने के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले हैं। इसलिए सरकार फिलहाल E20 ब्लेंडिंग कार्यक्रम को ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण नीति के लिहाज से महत्वपूर्ण मानती है।
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