Indian Rupee Falls : भारतीय मुद्रा पर दबाव लगातार गहराता जा रहा है और डॉलर के मुकाबले रुपया एक बार फिर रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंच गया है। सोमवार, 18 मई को शुरुआती कारोबार में रुपया लगभग 96.20 प्रति डॉलर तक फिसल गया, जिससे बाजार में हलचल तेज हो गई।

साल 2026 की शुरुआत से ही रुपये की चाल कमजोर बनी हुई है। पिछले कुछ महीनों में यह करेंसी करीब 5.5% से अधिक टूट चुकी है, और इसकी सबसे बड़ी वजह वैश्विक हालात और घरेलू दबावों का एक साथ असर माना जा रहा है।
Written by Kajal Panchal • Published on : 18 May 2026
IBN24 News Network : रुपये की गिरावट में सबसे अहम भूमिका कच्चे तेल की कीमतों ने निभाई है। पश्चिम एशिया में तनाव और ईरान युद्ध के चलते ग्लोबल मार्केट में क्रूड ऑयल लगातार ऊंचाई पर बना हुआ है।
ब्रेंट क्रूड के 110 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने से भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ा है। चूंकि भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा बाहर से खरीदता है, इसलिए हर बढ़ोतरी सीधे डॉलर की मांग को बढ़ा देती है। यही वजह है कि विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये पर लगातार दबाव बना हुआ है।
विदेशी निवेशकों की निकासी ने बढ़ाई चिंता

भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों की तेज निकासी भी रुपये की कमजोरी का बड़ा कारण बनी है। हाल के महीनों में लगभग 20 अरब डॉलर (करीब ₹1.6 लाख करोड़) का आउटफ्लो दर्ज किया गया है।
जब विदेशी निवेशक बाजार से पैसा निकालते हैं तो वे उसे डॉलर में बदलते हैं, जिससे रुपये की मांग घटती है और डॉलर मजबूत होता है। इसका सीधा असर करेंसी मार्केट पर दिखाई दे रहा है।
चालू खाता घाटा और आर्थिक असंतुलन
देश का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) भी धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह इस वित्त वर्ष में GDP के 2% से ऊपर जा सकता है।
यह स्थिति इस बात का संकेत है कि देश में विदेशी मुद्रा का बहिर्वाह अधिक और इनफ्लो कम हो रहा है। लगातार तीन साल से भुगतान संतुलन पर दबाव बने रहने से रुपये की स्थिरता प्रभावित हो रही है।
ग्लोबल मार्केट का असर और सुरक्षित निवेश की ओर रुझान
वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितता के बीच निवेशक सुरक्षित विकल्पों की ओर शिफ्ट कर रहे हैं। अमेरिका और अन्य विकसित देशों के बॉन्ड पर बेहतर रिटर्न मिलने से पैसा उभरते बाजारों से बाहर जा रहा है।
इस पूंजी निकासी का असर भारत जैसे देशों की करेंसी पर सीधे दिखाई देता है, क्योंकि विदेशी निवेश घटने से डॉलर की मांग बढ़ जाती है।
RBI का हस्तक्षेप और सीमित राहत

रुपये को स्थिर करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक लगातार बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है और डॉलर की बिक्री कर रहा है। इसके चलते देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी धीरे-धीरे घटा है।
हालिया आंकड़ों के अनुसार Forex Reserves करीब $720 बिलियन से घटकर लगभग $697 बिलियन पर आ गए हैं। हालांकि यह अभी भी सुरक्षित स्तर पर है, लेकिन लगातार हस्तक्षेप की अपनी सीमाएं हैं।
एशिया में सबसे कमजोर प्रदर्शन
2026 में अब तक रुपया एशिया की प्रमुख मुद्राओं में सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली करेंसी बन चुका है। फरवरी से शुरू हुए वैश्विक तनाव के बाद इसमें लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है और यह कई बार रिकॉर्ड निचले स्तर को छू चुका है।
आगे की स्थिति क्या संकेत देती है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और विदेशी निवेशकों की निकासी जारी रहती है, तो रुपये पर दबाव कम होना मुश्किल है।
ऐसी स्थिति में सरकार और RBI कुछ कदम उठा सकते हैं, जिनमें शामिल हो सकते हैं—
- पेट्रोल-डीजल मूल्य नीति में बदलाव
- एनआरआई डिपॉजिट स्कीम को बढ़ावा
- विदेशी भेजे जाने वाले धन पर नियंत्रण
- ब्याज दरों में संभावित बदलाव
आम जनता पर असर साफ दिखने लगा
कमजोर रुपये का असर अब सिर्फ बाजार तक सीमित नहीं है। आयातित सामान महंगा होने से महंगाई का दबाव बढ़ रहा है। विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों की लागत भी कई लाख रुपये तक बढ़ चुकी है। वहीं, आयात पर निर्भर छोटे और मझोले उद्योग—जैसे फूड प्रोसेसिंग और काजू उद्योग—सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। कई यूनिट्स पर लागत बढ़ने से संचालन मुश्किल हो गया है।
डॉलर के मुकाबले रुपये की लगातार गिरावट सिर्फ एक आर्थिक उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि वैश्विक संकट, तेल बाजार और पूंजी प्रवाह के बड़े बदलावों का परिणाम है। फिलहाल हालात यह संकेत दे रहे हैं कि जब तक अंतरराष्ट्रीय तनाव और पूंजी निकासी पर नियंत्रण नहीं होता, रुपये पर दबाव बना रह सकता है।
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