Internet Shutdown Fear : अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव अब सिर्फ मिसाइल हमलों और सैन्य टकराव तक सीमित नहीं रहा। इस संघर्ष का असर अब दुनिया की डिजिटल लाइफलाइन तक पहुंचता दिखाई दे रहा है। तेल सप्लाई, वैश्विक व्यापार और शेयर बाजार के बाद अब इंटरनेट को लेकर भी चिंता बढ़ने लगी है। यही वजह है कि ईरान के एक बयान ने भारत समेत कई देशों की टेंशन बढ़ा दी है।

Written by Kajal Panchal • Published on : 20 May 2026
IBN24 News Network : दरअसल, हाल ही में ईरान की तरफ से समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट केबल्स पर शुल्क लगाने का संकेत दिया गया। पहली नजर में यह सामान्य आर्थिक बयान लग सकता है, लेकिन टेक्नोलॉजी और साइबर एक्सपर्ट इसे बेहद गंभीर मान रहे हैं। इसकी वजह यह है कि दुनिया का अधिकांश इंटरनेट ट्रैफिक इन्हीं अंडरसी केबल्स के जरिए चलता है।
समुद्र के नीचे छिपा है इंटरनेट का असली नेटवर्क

आम तौर पर लोग सोचते हैं कि इंटरनेट सिर्फ मोबाइल टावर या सैटेलाइट से चलता है, लेकिन असल में दुनिया की डिजिटल कनेक्टिविटी समुद्र के नीचे बिछी हजारों किलोमीटर लंबी फाइबर ऑप्टिक केबल्स पर निर्भर करती है। ये केबल्स अलग-अलग देशों और महाद्वीपों को जोड़ती हैं और सेकंडों में डेटा ट्रांसफर करती हैं।
मध्य पूर्व का स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ऐसा ही एक रणनीतिक इलाका है। यह समुद्री रास्ता पहले से तेल सप्लाई के लिए बेहद अहम माना जाता है, लेकिन अब सामने आया है कि यहां से कई बड़ी इंटरनेट केबल्स भी गुजरती हैं। यही कारण है कि इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने से इंटरनेट नेटवर्क को लेकर भी चिंता पैदा हो गई है।
ईरान के बयान से क्यों मची हलचल ?
ईरान के सैन्य प्रवक्ता इब्राहिम जोल्फाघरी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि इंटरनेट केबल्स पर शुल्क लगाया जा सकता है। यानी जो कंपनियां इन केबल्स का इस्तेमाल करेंगी, उन्हें अतिरिक्त भुगतान करना पड़ सकता है।
हालांकि अभी तक इस पर कोई आधिकारिक नीति लागू नहीं हुई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ऐसा कदम उठाया जाता है, तो इसका असर इंटरनेट सेवाओं की लागत और स्पीड दोनों पर पड़ सकता है। इतना ही नहीं, अगर किसी वजह से इन केबल्स में रुकावट आती है, तो कई देशों का इंटरनेट ट्रैफिक प्रभावित हो सकता है।
दुनिया की इंटरनेट लाइनों का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है
टेक डेटा के अनुसार, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के नीचे FALCON, 2Africa, SeaMeWe-6, AAE-1 और GBICS जैसी कई बड़ी इंटरनेशनल केबल्स मौजूद हैं। ये केबल्स एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बीच डेटा ट्रांसफर का बड़ा हिस्सा संभालती हैं।

यानी अगर इस रूट पर कोई तकनीकी या राजनीतिक संकट पैदा होता है, तो इसका असर सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं रहेगा। इंटरनेट स्पीड, क्लाउड सर्विस, इंटरनेशनल बैंकिंग और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक प्रभावित हो सकते हैं।
भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता ?
भारत के लिए यह मामला इसलिए ज्यादा अहम माना जा रहा है क्योंकि इन अंडरसी केबल्स में से कई सीधे मुंबई और चेन्नई से जुड़ती हैं। भारत का अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट ट्रैफिक काफी हद तक इन्हीं नेटवर्क्स पर निर्भर करता है।
देश की बड़ी टेलीकॉम और इंटरनेट कंपनियां जैसे एयरटेल और जियो भी इसी नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल करती हैं। ऐसे में अगर इस रूट पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता है या नेटवर्क में कोई बाधा आती है, तो भारत में इंटरनेट सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।
क्या-क्या हो सकता है प्रभावित ?

क्या भविष्य में इंटरनेट भी बनेगा युद्ध का हथियार ?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में युद्ध सिर्फ जमीन, हवा और समुद्र तक सीमित नहीं रहेंगे। साइबर अटैक, डेटा कंट्रोल और इंटरनेट नेटवर्क पर दबाव जैसी रणनीतियां भी देशों के बीच ताकत दिखाने का नया तरीका बन सकती हैं।
यही वजह है कि ईरान के एक बयान ने दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कहीं भविष्य की सबसे बड़ी जंग डिजिटल दुनिया में तो नहीं लड़ी जाएगी।
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