Haryana Paddy Procurement : हरियाणा में धान खरीद और उठान में आ रही दिक्कतों के बीच प्रदेश सरकार ने तुलाई की प्रक्रिया तेज करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। अब मंडियों में धान की तुलाई के लिए राइस मिलों में स्थापित धर्मकांटों का भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले विभाग के इस फैसले का उद्देश्य खरीद प्रक्रिया को गति देना और किसानों को भुगतान में होने वाली देरी कम करना है।

Written by Kajal Panchal • Published on : 9 October 2026
IBN24 NEWS NETWORK : हालांकि, सरकार के इस फैसले पर किसान यूनियन ने सवाल उठाए हैं। भारतीय किसान यूनियन (चढ़ूनी) से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना है कि यदि मंडियों के बजाय सीधे राइस मिलों में धान की तुलाई की जाती है, तो खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता प्रभावित हो सकती है। यूनियन ने फर्जी खरीद और दूसरे राज्यों से आने वाले धान को सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किए जाने की आशंका भी जताई है।
7 अक्टूबर तक 5.64 लाख मीट्रिक टन धान की खरीद
विभाग की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, 7 अक्टूबर 2026 तक हरियाणा में 5,64,577 मीट्रिक टन धान की खरीद की जा चुकी थी। हालांकि, इस अवधि तक केवल 1,03,089 मीट्रिक टन धान का ही उठान हो पाया था।

खरीद और उठान के बीच बड़े अंतर के कारण मंडियों में व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे थे। इसके अलावा, किसानों को अपनी उपज बेचने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के भुगतान से जुड़ी प्रक्रिया में भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। इसी स्थिति को देखते हुए विभाग ने तुलाई के लिए उपलब्ध संसाधनों का दायरा बढ़ाने का निर्णय लिया है। अब राइस मिलों में मौजूद धर्मकांटों का उपयोग भी निर्धारित प्रक्रिया के तहत किया जा सकेगा।
धर्मकांटों की कमी दूर करने के लिए विभाग का कदम
धान खरीद के दौरान मंडियों में तुलाई की व्यवस्था महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि वाहनों की तुलाई समय पर नहीं होती, तो धान के उठान में देरी हो सकती है। इससे मंडियों में जगह की उपलब्धता और खरीद की रफ्तार भी प्रभावित होती है। विभाग के अनुसार, कई राइस मिलों में पहले से धर्मकांटे उपलब्ध हैं। ऐसे में इनका इस्तेमाल करके तुलाई की क्षमता बढ़ाई जा सकती है।

इस संबंध में खाद्य एवं आपूर्ति विभाग के अतिरिक्त निदेशक (खरीद) ने हैफेड (HAFED), हरियाणा राज्य भंडारण निगम (HWWC) और सभी जिला खाद्य एवं पूर्ति नियंत्रकों (DFSCs) को दिशा-निर्देश जारी किए हैं। हालांकि, इस व्यवस्था के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए तुलाई के रिकॉर्ड, वाहन पंजीकरण और खरीद से संबंधित नियमों का पालन सुनिश्चित करना जरूरी होगा।
किसान यूनियन ने फैसले का किया विरोध, फर्जी खरीद की आशंका
सरकार के फैसले पर भारतीय किसान यूनियन (चढ़ूनी) के प्रतिनिधियों ने आपत्ति जताई है। यूनियन का कहना है कि धान की तुलाई मंडियों या निर्धारित सरकारी धर्मकांटों पर ही होनी चाहिए, ताकि प्रत्येक वाहन की उपज का वजन और खरीद का रिकॉर्ड पारदर्शी तरीके से दर्ज हो सके।
यूनियन ने आशंका जताई कि यदि बिना उचित तुलाई और रिकॉर्डिंग के धान सीधे राइस मिलों तक पहुंचता है, तो दूसरे राज्यों से सस्ता धान लाकर सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करने जैसी गड़बड़ियों की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि, यह यूनियन की ओर से जताई गई आशंका है, किसी प्रमाणित गड़बड़ी का निष्कर्ष नहीं। किसान प्रतिनिधियों के अनुसार, खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए प्रत्येक वाहन की तुलाई और उससे जुड़े दस्तावेजों का सत्यापन जरूरी है।
कांटों की कमी नहीं, विभागीय तैयारी में देरी का आरोप
किसान यूनियन ने धान उठान में देरी के लिए धर्मकांटों की कमी को मुख्य कारण मानने पर भी सवाल उठाए हैं। यूनियन के प्रतिनिधियों का तर्क है कि एक वाहन की तुलाई में लगभग 5 से 10 मिनट लगते हैं। ऐसे में उठान प्रभावित होने के पीछे अन्य प्रशासनिक कारणों की भी जांच होनी चाहिए।
यूनियन ने नरवाना मंडी का उदाहरण देते हुए आरोप लगाया कि 29 सितंबर से खरीद शुरू होने के बावजूद 8 अक्टूबर तक खरीद एजेंसियों को राइस मिलें आवंटित नहीं की गई थीं और वाहनों का पंजीकरण भी नहीं हुआ था। यूनियन का कहना है कि यदि खरीद एजेंसियों को समय पर राइस मिलें आवंटित की जातीं और वाहनों का पंजीकरण पूरा होता, तो धान उठान में तेजी लाई जा सकती थी। इन आरोपों पर संबंधित विभाग और खरीद एजेंसियों का पक्ष सामने आना भी महत्वपूर्ण है, ताकि देरी के वास्तविक कारणों का स्पष्ट पता चल सके।
किसानों के लिए क्या मायने रखता है यह फैसला ?
राइस मिलों के धर्मकांटों पर तुलाई की अनुमति मिलने से खरीद प्रक्रिया की क्षमता बढ़ सकती है। यदि व्यवस्था पारदर्शी तरीके से लागू होती है, तो वाहनों की तुलाई में लगने वाला समय कम करने और मंडियों से धान का उठान तेज करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, किसानों की चिंताओं को देखते हुए तुलाई के रिकॉर्ड, वाहन की पहचान, धान के स्रोत और खरीद संबंधी दस्तावेजों का सत्यापन बेहद जरूरी होगा। इसके साथ ही, भुगतान और उठान की प्रक्रिया में होने वाली देरी को दूर करना भी विभाग के सामने बड़ी चुनौती है।
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